mohan.bhagwat | Mohan Bhagwat | शिवसेना के संस्थापक 
हिंदुत्व के महानायक 
स्वर्गीय  श्रद्धेय  श्रीमान बालासाहेब जी ठाकरे जी
को  स्मृति दिवस पर
शत् शत् नमन ।
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शिवसेना के संस्थापक हिंदुत्व के महानायक स्वर्गीय श्रद्धेय श्रीमान बालासाहेब जी ठाकरे जी को स्मृति दिवस पर शत् शत् नमन । हरि ॐ शांति

mohan.bhagwat | Mohan Bhagwat | श्री राम जन्मभूमि आंदोलन
के पुरोधा। हिंदुत्व के महानायक व्
विश्व हिंदू परिषद के संरक्षक रहे।
स्वर्गीय  श्रद्धेय  श्रीमान अशोक जी सिंघल
को  स्मृति दिवस पर
शत् शत् नमन ।
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श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के पुरोधा। हिंदुत्व के महानायक व् विश्व हिंदू परिषद के संरक्षक रहे। स्वर्गीय श्रद्धेय श्रीमान अशोक जी सिंघल को स्मृति दिवस पर शत् शत् नमन । हरि ॐ शांति

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"नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्। महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥१॥ प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता इमे सादरं त्वां नमामो वयम् त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम् शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये। अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम् सुशीलं जगद् येन नम्रं भवेत् श्रुतं चैव यत् कण्टकाकीर्णमार्गम् स्वयं स्वीकृतं नः सुगङ्कारयेत्॥२॥ समुत्कर्ष निःश्रेयसस्यैकमुग्रम् परं साधनं नाम वीरव्रतम् तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्। विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर् विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम् समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥३॥ ॥भारत माता की जय॥"

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"शंशय की स्थिति में अंतर आत्मा की आवाज सुनो; क्योंकि मन और मस्तिस्क में द्वन्द की परिस्थिति ही शंशय को जन्म देती है। मस्तिष्क भौतिकता से ग्रषित और तर्कों से बंधा होता है पर अंतरात्मा सत्य का स्वर है; अतः बहोत हद तक संभव है की अंतरात्मा के स्वर को अपनी सार्थकता सिद्ध करने के सन्दर्भ में तर्कों का आभाव हो, ऐसी परिस्थिति में आत्मविश्वास की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। आखिर, विज्ञानं और आध्यात्म में केवल तथ्यों के तर्क और उद्देश्य का अंतर है: प्रयोग दोनों की ही प्रक्रिया है ; विज्ञानं के नियमानुसार किसी भी देह को स्थिरता की स्थिति से गति शील बनाने के लिए या फिर गतिशीलता से स्थिरता तक पहुंचाने के लिए बाह्य शक्ति के प्रभाव की आवश्यकता होती है ; मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित शरीर के लिए अंतरात्मा वही उत्प्रेरक का काम करती है ! सीमिताएं मस्तिष्क के लिए होती हैं क्योंकि उसके लिए शरीर की धारणा इन्द्रियों की अनुभूति पर आधारित होता है जिसे वह जीवन के अनुकूलन के क्रम में अपने अस्तित्व का परिचय मान लेता है ; अतः समझ के विस्तार के लिए इन्द्रियों का विकास महत्वपूर्ण हो जाता है। परन्तु अंतरात्मा को ज्ञान है की वह शरीर के परिधि तक सीमित नहीं; अतः वह संवेदनाओं द्वारा शाषित होती है जो जीवन के लिए स्वाभाविक प्रवृति है। मस्तिष्क एक संसाधन है , शरीर एक उपकरण और अंतरात्मा की भूमिका मार्गदर्शक व निर्णायक की, ऐसे में, सहूलियतों, सुविधाओं और लाभ की संभावनाओं को सुरक्षित करने वाले तर्कों के प्रभाव में आकर निर्णय का अधिकार अंतरात्मा के बदले मस्तिष्क को सौंप दे तो हो सकता है जीवन समृद्ध व सुरक्षित प्रतीत हो परन्तु उसमे निश्चित तौर पर सार्थकता और संतुष्टि का आभाव होगा ; परिणाम स्वरुप, जीवन के क्रमगत विकास की प्रक्रिया रुक जायेगी। वैसे भी मनुष्य अधिक कुछ तो कर नहीं सकता अन्यथा प्राकृतिक आपदाओं को भी नियंत्रित किया जा सकता और जीवन को उनका भय न होता, समस्या तो ये है की मनुष्य जो कर सकता है वो भी नहीं करने के कारण ढून्ढ लेता है। मनुष्य के पास कर्म का विकल्प नहीं बस निर्णय का अधिकार है, जो अन्ततः नियति निर्धारित करती है। अब अगर कर्म के प्रयास में किये जाने वाले श्रम का प्रभाव क्रिया की परिधि तक सीमित रह जाए तो जीवन का क्रमगत विकास ही रुक जाएगा। इसीलिए ऐसी परिस्थिति में मानव विवेक का विकास के लिए परिवर्तन अवश्यंभावी हो जाता है ; फिर प्रक्रिया जो भी हो। यही कालचक्र की प्रवृति है जिसके पुनरावृति का अनुभव उपर्युक्त तथ्य को प्रमाणित करता है ! Contd⤵⤵

mohan.bhagwat | Mohan Bhagwat | दरिया है हम,
अपनी फितरत पहचानते है,
चल पड़ेंगे जिधर 
रास्ते बन जाएंगे । Instagram Photos | videos | post

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दरिया है हम, अपनी फितरत पहचानते है, चल पड़ेंगे जिधर रास्ते बन जाएंगे ।

mohan.bhagwat | Mohan Bhagwat | शब्द ही ज्ञान की विद्द्या, धर्म का उपदेश, संविधान के नियम, न्याय का निर्णय और भावनाओं की अभिव्यक्ति है और यही शब्दों की शक्ति के प्रभाव का प्रमाण भी, इसलिए,
....आज जब इस पेज पर प्रकाशित हो रहे शब्दों को प्राप्त परिचय के प्रति अविश्वास पैदा करने के भांति भांति के प्रयास चल रहे हैं, मैं उसे इस पेज पर लिखे गए शब्दों का समाज में पड़ रहे प्रभाव के प्रतिक्रिया के रूप में ही देखता हूँ ....जिससे समाज का आज वह वर्ग विचलित लगता है जिसके लिए सत्ता ही राष्ट्र का पर्याय है और राजनीति राष्ट्र से भी अधिक महत्वपूर्ण । ऐसे में, साधारण से शब्दों को प्रभावशाली बनाने का श्रेय शब्दों को प्राप्त परिचय को ही जाता है।
जितना प्रयास इस पेज पर प्रस्तुत शब्दों को प्राप्त परिचय के प्रति अविश्वास पैदा करने के लिए किया जा रहा है यदि वही प्रयास उन शब्दों को पढ़ने -समझने में किया जाता तो निश्चित रूप से आज भारत की वास्तविकता कुछ और होती; अभी भी देर नहीं हुई, जब जागो तब सवेरा।
जहाँ व्यक्ति का महत्व विचारों से होना था वहां व्यक्ति के महत्व के आधार पर विचार महत्वपूर्ण माने जाने लगे हैं, और इसीलिए, यहाँ प्रस्तुत विचारों को प्राप्त व्यक्ति के परिचय के प्रति अविश्वास पैदा कर समाज को सत्य से विमुख और वास्तविकता से भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है, पर आखिर क्यों?
ऐसे किसी प्रयास से किसे लाभ हो सकता है, स्वाभाविक है उन्हीं को जिनके लिए सत्य ही आज समस्या बन गयी है, तभी, उसकी अभिव्यक्ति को बाधित करने का प्रयास भी चल रहा है।
सचमुच वो कोई और समय था जब सत्य को स्वीकृति के लिए प्रचार की आवश्यकता नहीं होती थी और न ही प्रचार तंत्र का प्रभाव सत्य के सत्यापन के लिए निर्णायक होता था; अन्यथा श्री राम भी रावण को लंका में नहीं मारते बल्कि चुनाव में अपनी सफलता सुनिश्चित करने के लिए उसे पकड़ कर अयोध्या लाते, खैर, यह दौर ही कुछ ऐसा है जहाँ रामलीला भी चुनावी लीला द्वारा प्रायोजित होता है।
वास्तव में हम भटक गए हैं, तभी, आज लोगों के दिल छोटे हो गए हैं और पूजा घर बड़े; धर्म औपचारिकता, पूजा एक प्रक्रिया और भक्ति आकांक्षाओं का आडम्बर बन गया है ; रिश्तों के व्यवसाईकरण के इस दौर में पढाई के महत्व का मूल्याङ्कन पगार की संभावनाएं करती हैं ; अंक ही परीक्षा का महत्व है और सीखने के लिए जीवन के पास व्यवहारिकता के अलावा कोई विषय ही नहीं बचा ; सचमुच, अंदर से हम इतने खोकले कभी न थे। गलती हमारे सीमित समझ की नहीं तो और किसकी जो आज हमारे सीमित ज्ञान के अनुभव ने हमें नयी संभावनाओं से भी प्रतिरक्षित कर दिया है।
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शब्द ही ज्ञान की विद्द्या, धर्म का उपदेश, संविधान के नियम, न्याय का निर्णय और भावनाओं की अभिव्यक्ति है और यही शब्दों की शक्ति के प्रभाव का प्रमाण भी, इसलिए, ....आज जब इस पेज पर प्रकाशित हो रहे शब्दों को प्राप्त परिचय के प्रति अविश्वास पैदा करने के भांति भांति के प्रयास चल रहे हैं, मैं उसे इस पेज पर लिखे गए शब्दों का समाज में पड़ रहे प्रभाव के प्रतिक्रिया के रूप में ही देखता हूँ ....जिससे समाज का आज वह वर्ग विचलित लगता है जिसके लिए सत्ता ही राष्ट्र का पर्याय है और राजनीति राष्ट्र से भी अधिक महत्वपूर्ण । ऐसे में, साधारण से शब्दों को प्रभावशाली बनाने का श्रेय शब्दों को प्राप्त परिचय को ही जाता है। जितना प्रयास इस पेज पर प्रस्तुत शब्दों को प्राप्त परिचय के प्रति अविश्वास पैदा करने के लिए किया जा रहा है यदि वही प्रयास उन शब्दों को पढ़ने -समझने में किया जाता तो निश्चित रूप से आज भारत की वास्तविकता कुछ और होती; अभी भी देर नहीं हुई, जब जागो तब सवेरा। जहाँ व्यक्ति का महत्व विचारों से होना था वहां व्यक्ति के महत्व के आधार पर विचार महत्वपूर्ण माने जाने लगे हैं, और इसीलिए, यहाँ प्रस्तुत विचारों को प्राप्त व्यक्ति के परिचय के प्रति अविश्वास पैदा कर समाज को सत्य से विमुख और वास्तविकता से भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है, पर आखिर क्यों? ऐसे किसी प्रयास से किसे लाभ हो सकता है, स्वाभाविक है उन्हीं को जिनके लिए सत्य ही आज समस्या बन गयी है, तभी, उसकी अभिव्यक्ति को बाधित करने का प्रयास भी चल रहा है। सचमुच वो कोई और समय था जब सत्य को स्वीकृति के लिए प्रचार की आवश्यकता नहीं होती थी और न ही प्रचार तंत्र का प्रभाव सत्य के सत्यापन के लिए निर्णायक होता था; अन्यथा श्री राम भी रावण को लंका में नहीं मारते बल्कि चुनाव में अपनी सफलता सुनिश्चित करने के लिए उसे पकड़ कर अयोध्या लाते, खैर, यह दौर ही कुछ ऐसा है जहाँ रामलीला भी चुनावी लीला द्वारा प्रायोजित होता है। वास्तव में हम भटक गए हैं, तभी, आज लोगों के दिल छोटे हो गए हैं और पूजा घर बड़े; धर्म औपचारिकता, पूजा एक प्रक्रिया और भक्ति आकांक्षाओं का आडम्बर बन गया है ; रिश्तों के व्यवसाईकरण के इस दौर में पढाई के महत्व का मूल्याङ्कन पगार की संभावनाएं करती हैं ; अंक ही परीक्षा का महत्व है और सीखने के लिए जीवन के पास व्यवहारिकता के अलावा कोई विषय ही नहीं बचा ; सचमुच, अंदर से हम इतने खोकले कभी न थे। गलती हमारे सीमित समझ की नहीं तो और किसकी जो आज हमारे सीमित ज्ञान के अनुभव ने हमें नयी संभावनाओं से भी प्रतिरक्षित कर दिया है। Contd⤵⤵